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जौनपुर। जिले में क्षारसूत्र विधि से भगंदर का इलाज शुरू, इस विधि से इलाज के दौरान दैनिक क्रिया व जरूरी काम में नहीं होती दिक्कत

जौनपुर(06मार्च)। भकंदर यानी भगंदर का इलाज जनपद में अब आसान तरीके से सम्भव हो गया है। इसका इलाज क्षार विधि से करना डाक्टर सभंव बता पा रहे हैं।

बता दें कि भगंदर का अंग्रेजी शब्द (फेस्टुला ) है। इसे देशी भाषा में एवं गांवों में ग्रामीण भकंदर भी कहते हैं। भगंदर का इलाज क्षारसूत्र विधि से ही संभव है। भकंदर गुदा द्वार के पास होने पिडिका (फोड़ा) जैसा होता है।

गुदा द्वार पर यह फोड़ा ज्यादातर भगंदर का रूप होती है। जहां यह भगंदर होता है वहां से हल्का पानी, मवाद अथवा ब्लड कुछ समय के अंतराल पर निकलता रहता है। भगन्दर के रोगी को बैठने, लेटने और शौच में बहुत दर्द होता है।इस रोग में गुदा द्वार में फुंसी या फोड़ा जैसा बन जाता है। इलाज न करने पर ये फोड़ा बढ़ता जाता है और गुदा के दूसरी तरफ तक पाइपनुमा रास्ता बना लेता है। इस फोड़े के कारण बैठने, लेटने और शौच करने जैसे सामान्य कामों में भी बहुत दर्द होता है और कई बार गुदा द्वार से खून और बदबूदार मल भी निकलने लगता है।

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डेढ़ दशक से इलाज कर रहे डा. वीपी गुप्ता ने बताया कि इसका इलाज केवल क्षारसूत्र से किया जा सकता है। क्षारसूत्र एक विशेष प्रकार के सूती के उपर क्षार नामक द्रव्य (पदार्थ) की कोटिंग करके बनाया जाता है। जो भगंदर की कड़ी दिवार को धीरे-धीरे गला लेता है।

भगंदर का यह पिडिका सामान्य पिडिका न होकर बल्कि एक ट्रैक (नली के आकार का रास्ता) से जुड़ी रहती है। डाक्टरों ने बताया कि इसका इलाज केवल क्षारसूत्र से किया जा सकता है। क्षारसूत्र एक विशेष प्रकार के सूती के उपर क्षार नामक द्रव्य (पदार्थ) की कोटिंग करके बनाया जाता है। जो भगंदर की कड़ी दीवार को धीरे-धीरे गला लेता है। फेस्टुला होने पर स्फिंटर मांस पेशी के नष्ट होने का खतरा बढ़ जाता है। सप्ताह में एक बार क्षारसूत्र को बदला जाता है। यही क्रिया कुछ सप्ताह तक चलती रहती है। भगंदर कुछ सप्ताह बाद ठीक हो जाता है। भगंदर की इलाज के दौरान मरीज अपनी दैनिक क्रिया करने में किसी तरह की दिक्कत नहीं आती है। मरीज को अपना काम करने में भी किसी तरह की परेशानी नहीं होती। मरीज कहीं भी आ जाकर वह अपना काम कर सकता है।

फोटो- डा. वीपी गुप्त क्षारसूत्र विशेषज्ञ

15 वर्षों से इलाज कर रहें भगंदर यानी फेस्टुला रोग विशेषज्ञ डा. वीपी गुप्त का कहना है कि अधिक समय तक फेस्टुला का इलाज नहीं कराने पर परेशानी बढ़ जाती है। इसे ठीक होने में भी अधिक समय लगता है। इतना ही नहीं भगंदर अधिक पुराना हो जाने पर कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। भगंदर के इलाज में छोटा सा आपरेशन किया जाता है। आपरेशन के बाद कुछ घंटे बाद मरीज को छोड़ दिया जाता है। इलाज के दौरान कुछ दिन तक मरीज को केवल आयुर्वेदिक दवाएं दी जाती है।

क्यों होता है भगन्दर या फेस्टूला

चिकित्सक डा. वीपी गुप्ता, मानस हास्पिटल भंडारी स्टेशन रोड जौनपुर बताते हैं कि भगन्दर या फेस्टूला का मुख्य कारण गुदा द्वार की ठीक से सफाई न करना है। गंदगी के कारण गुदा द्वार के आस-पास बैक्टीरिया हो जाते हैं, जो भगन्दर का कारण बनते हैं। इसके अलावा कई बार गुदा द्वार को ज्यादा खुजला देने या बाल न साफ करने से भी भगन्दर हो जाता है। लंबे समय तक कब्ज की समस्या रहने पर भी ये पीड़ादायक रोग हो सकता है। कई बार गुदामार्ग की चोट भी इस रोग का कारण बन सकती है।

भगंदर यानी भकंदर रोग की लक्षण क्या है

मल त्याग करते समय दर्द होना, मलद्वार से खून का स्राव होना, गुदा के पास बार-बार फोड़ा होना, मवाद का स्राव होना, मल द्वार के आसपास दर्द, खूनी या दुर्गंधयुक्त स्राव होना, मल द्वार के आसपास जलन होना, मल द्वार के आसपास सूजन, थकान महसूस होना, इन्फेक्शन के कारण बुखार और ठंड लगना आदि।

कैसे होती है भगन्दर की शुरुआत

भगन्दर की शुरुआत में गुदा मार्ग में छोटी फुंसियां होती हैं, जिनमें छूने या बैठने पर हल्का दर्द हो सकता है। कुछ सप्ताह बाद ही इन फुंसियों में मवाद आ जाता है और ये फूट जाती हैं। ऐसे में रोगी को बैठने, लेटने और शौच करने में दर्द का अनुभव होने लगता है। कई बार ये रोग इतना पीड़ाकारी होता है कि रोगी न तो पेट के बल लेट पाता है और न पीठ के बाल। इसके अलावा सीढ़ियां चढ़ने और उतरने में भी बहुत तकलीफ होती है।

जौनपुर जनपद में क्षारसूत्र विधि से कहां कराएं इलाज

इसके इलाज के लिए मरीज डा.वीपी गुप्ता मानस हास्पिटल भंडारी स्टेशन अहियापुर रोड जौनपुर, मो. नंबर 9839502346) पर संम्पर्क कर सकतें है।

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